कहीं न कहीं हम अपने ही देवी देवताओं का अपमान कर रहे हैं । सड़क पर एक पेड़ के नीचे रखी ये प्रतिमाएं देख कर आपको नहीं लगता के इस तरह की बेकद्री करना ठीक नहीं है। दूसरी ओर प्रशाशन का भी कभी इस और ध्यान नहीं गया। सड़क और खुले में रखी ये प्रतिमाएं हमसे कुछ कहना चाहती है। जिस तरह से हम जब देवी देवताओं को अपने घर लाते है तो उनका इतना स्वागत सत्कार करते है।तो फिर किन परिस्थितियों में हम ऐसा करने पर मजबूर है?
क्यूं ना हम एक नई पहल करें , जिससे हम विसर्जन की प्रक्रिया को एक नया तरीका या दिशा दें। जिससे हमारे भगवानों का अपमान भी ना हो और विसर्जन की प्रक्रिया भी अच्छे से सफल होजाए। इस प्रक्रिया के तहत नयी पद्धति से हम विसर्जन कर सकते हैं। हम जल की बजाय मूर्तियों को
भू विसर्जित कर दें। जिससे प्लास्टर ऑफ़ पेरिस या केमिकल से बनी मूर्तियों से नदियाँ भी प्रदूषित नहीं होंगी। और सम्मानीय ढंग से हम उन्हें विसर्जित कर सकेंगे ताकि खुले में रहने से कोई कूड़ा करकट या जानवरो के संपर्क में आकर उनका अपमान न हो।
कई शहरों और राज्यों में ये मुहीम चल रही है। आपको क्या लगता है हमें भी एक कदम बढ़ाना चाहिए नयी दिशा की ओर.
